Monday, August 6, 2007

कुछ काले कोट



कुछ काले कोट कचहरी के।

ये उतरें रोज अखाड़े
में
सिर से भी ऊँचे भाड़े
में
पूरे हैं नंगे झाड़े
में

ये कंठ लंगोट कचहरी
के।

बैठे रहते मौनी
साधे
गद्दी पै कानूनी
पाधे
पूरे में से उनके
आधे-

हैं आधे नोट कचहरी
के।

छलनी कर देते आँतों
को
अच्छे-अच्छों के दाँतों
को
तोड़े सब रिश्ते-नातों
को

ये हैं अखरोट कचहरी
के।

डॉ० कुँअर बेचैन

4 comments:

अनूप शुक्ल said...

अच्छा लिखा है बेचैन जी ने।

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया रहा यह. :)

सतीश सक्सेना said...

बहुत पसंद आया !

Anonymous said...

mene bechain jee ko bare-bare kaivi sammlanon ki shobha badhate to dekha hi he, unhe door gaon ke kavi sammelan men dibiya ki roshni men kuchek shrotaon ke samne bhi usi gamjoshi se kavita path karte bhi dekha hai jo unhe aaj ke daur ka aadarsh kavi banata hai.....balki kahun to rashtriya kavi