Wednesday, January 16, 2008

जिसे बनाया वृद्ध पिता के श्रमजल ने

जिसे बनाया वृद्ध पिता के श्रमजल ने
दादी की हँसुली ने, माँ की पायल ने
उस सच्चे घर की कच्ची दीवारों पर
मेरी टाई टँगने से कतराती है।

माँ को और पिता को यह कच्चा घर भी
एक बड़ी अनुभूति, मुझे केवल घटना
यह अंतर ही संबंधों की गलियों में
ला देता है कोई निर्मम दुर्घटना

जिन्हें रँगा जलते दीपक के काजल ने
बूढ़ी गागर से छलके गंगाजल ने
उन दीवारों पर टँगने से पहले ही
पत्नी के कर से साड़ी गिर जाती है।

जब से युग की चकाचौंध के कुहरे ने
छीनी है आँगन से नित्य दिया-बाती
तबसे लिपे आँगनों से, दीवारों से
बंद नाक को सोंधी गंध नहीं आती

जिसे चिना था घुटनों तक की दलदल ने
सने-पुते-झीने ममता के आँचल ने
पुस्तक के पन्नों में पिची हुई राखी
उस घर को घर कहने में शरमाती है।

साड़ी-टाई बदलें, या ये घर बदलें
प्रश्नचिह्न नित और बड़ा होता जाता
कारण केवल यही, दिखावों से जुड़ हम
तोड़ रहे अनुभूति, भावना से नाता

जिन्हें दिया संगीत द्वार की साँकल ने
खाँसी के ठनके, चूड़ी की हलचल ने
उन संकेतों वाले भावुक घूँघट पर
दरवाज़े की ' कॉल वैल ' हँस जाती है।

डॉ० कुँअर बेचैन

12 comments:

Parul said...

aadarniya KUNWAR ji
aapki kavitaaye chithhajagat pe paa kar bahut khushi mehsuus ho rahi hai...bahut aabhaar.

भोजवानी said...

साड़ी-टाई बदलें, या ये घर बदलें

......अब कहां बदलकर जाएंगे
.......इसमें ही कलम रवां करते रहिए।

जेपी नारायण said...

साड़ी-टाई बदलें, या ये घर बदलें

.....अब कहां बदलकर जाएंगे
.....इसमें ही कलम रवां करते रहिए।

कंचन सिंह चौहान said...

किन शब्दों में प्रशंसा की जाए कि ये ना लगे मैं सूरज को दिया दिखा रही हूँ....! यूँ भी बहुत बड़ी प्रशंसक हूँ बेचैन जी की...! कविता की हर पंक्ति सुंदर...!

राकेश खंडेलवाल said...

जब से युग की चकाचौंध के कुहरे ने
छीनी है आँगन से नित्य दिया-बाती
तबसे लिपे आँगनों से, दीवारों से
बंद नाक को सोंधी गंध नहीं आती

यह निर्मम सच्चाई अनुभव तो होती
टूटी सीपी में तलशते हैं मोती
सोने के पानी में डूबी जो कलमें
कितनी बार सत्य दर्शित कर पाती हैं

एक बेहद खूबसूरत गीत के लिये हार्दिक बधाई स्वीकारें

कुँअर said...

आप सबका रचना पंसद करने के लिये धन्यवाद...
कुँअर

अनूप भार्गव said...

>जिसे बनाया वृद्ध पिता के श्रमजल ने
>दादी की हँसुली ने, माँ की पायल ने
>उस सच्चे घर की कच्ची दीवारों पर
>मेरी टाई टँगने से कतराती है।

कुछ नहीं रह जाता है कहने के लिये , इन पंक्तियों को पढने के बाद ....

ऋतेश पाठक said...

इतनी संवेदनात्मक पंक्तियां पढकर वाह से पहले आह निकलती है. धन्यवाद...

govind said...

बहुत ख़ूब
आप की तो बात ही अलग है
जनाब अशोक साहिल का शे’र आप के लिए ही मुनासिब है

मुझे अल्लाह ने इक ख़ास ख़ूबी से नवाज़ा है
जिन्हें छूता हूँ उन लफ़्ज़ों से ख़ुशबू आने लगती है

गोविन्द गुलशन

govind said...

बहुत ख़ूब
आप की तो बात ही अलग है
जनाब अशोक साहिल का शे’र आप के लिए ही मुनासिब है

मुझे अल्लाह ने इक ख़ास ख़ूबी से नवाज़ा है
जिन्हें छूता हूँ उन लफ़्ज़ों से ख़ुशबू आने लगती है

गोविन्द गुलशन

दीप said...

bahut sundar sir
aap ka to andaaj hi niraala hai
http://deep2087.blogspot.com

Anonymous said...

बचपन के एक भाषण में इस कविता का कुछ भाग सुनाया था , परन्तु पता नहीं था की इसके रचनाकार आप हैं | जब भी इस कविता को गुनगुनाता हूँ पलकें भीग जाती हैं | आशा करता हूँ ज्ञान का यह दीपक ऐसे ही प्रज्वलित होता रहेगा |

दीपक