Friday, January 2, 2009

जिस रोज़ से पछवा चली...

जिस रोज़ से

पछवा चली

आँधी खड़ी है गाँव में

उखड़े कलश, है कँपकँपी

इन मंदिरों के पाँव में।



जड़ से हिले बरगद कई

पीपल झुके, तुलसी झरी

पन्ने उड़े सद्ग्रंथ के

दीपक बुझे, बाती गिरी


मिट्टी हुआ

मीठा कुआँ

भटके सभी अँधियाव में

उखड़े कलश, है कँपकँपी

इन मंदिरों के पाँव में।


बँधकर कलावों में बनी

जो देवता, 'पीली डली'

वह भी हटी, सतिए मिटे

ओंधी पड़ी गंगाजली


किंरचें हुआ

तन शंख का

सीपी गिरी तालाब में

उखड़े कलश, है कँपकँपी

इन मंदिरों के पाँव में।

कुँअर बेचैन

5 comments:

रंजीत said...

Khair mana raha hun ki kuch log to hain jo apne man-mijaj ko is PACHUA se bachaye hue hain.

bar-bar dhyan karne walee Kavita.badhayee.
Ranjit
Ranchi

रंजना said...

क्या कहूँ ........ मंत्रमुग्ध हूँ......

जिस रोज़ से

पछवा चली

आँधी खड़ी है गाँव में

उखड़े कलश, है कँपकँपी

इन मंदिरों के पाँव में।

इस " पछुआ " ने मन को ऐसे मोहा कि मन मौन निःशब्द हो गया.
रचना की प्रशंशा शब्दों में नही की जा सकती.......इसे तो बस पढ़कर विभोर हुआ जा जा सकता है.

आशीष कुमार 'अंशु' said...

अद्भूत ...

.....

नीरज गोस्वामी said...

लाजवाब...आप की क्या तारीफ करें...??? शब्द हीन हैं...
नीरज

Mired Mirage said...

बहुत सुन्दर !
घुघूती बासूती