Monday, October 13, 2008

शाम

संध्या के केशों में
बँध गया
'रिबन'
-सूरज की लाली का।

हँसुली-सा
इंद्रघनुष
बिंदिया-सा सूर्य
मेघों की
माला में
ज्योतित वैदूर्य्य
सतरंगे वेशों में
बस गया
बदन

-फूलभरी डाली का।

कुंडल-से
झूम रहे
क्षितिजों पर वृंत
चूम रहा
अधरों को
मधुऋतु का कंत
तन-मन के देशों को
दे गया
गगन
-मौसम ख़ुशहाली का।

कुँअर बेचैन

4 comments:

मनुज मेहता said...

हँसुली-सा
इंद्रघनुष
बिंदिया-सा सूर्य
मेघों की
माला में
ज्योतित वैदूर्य्य
सतरंगे वेशों में
बस गया
बदन

wah kya khoob kaha, bechan sahab, bahut hi badhiya bimb. meri badhai sweekaren

विवेक सिंह said...

अति सुन्दर !

रंजना said...

वाह....अति सुंदर..शब्दों की कलाकारी से मनोहर चित्र खींचा गया है.मन को मुग्ध करती पंक्तियाँ.

डॉ० कुअँर बेचैन said...

Aap sabka bahut bahut shukriya....