Thursday, November 20, 2008

रिश्तों को घर दिखलाओ...

माँ की साँस

पिता की खाँसी

सुनते थे जो पहले, अब वे कान नहीं।


छोड़ चेतना को

जड़ता तक

आना जीवन का

पत्थर में परिवर्तित पानी

मन के आँगन का-

यात्रा तो है; किंतु सही अभियान नहीं।

सुनते थे जो पहले, अब वे कान नहीं।


संबंधों को

पढ़ती है

केवल व्यापारिकता

बंद कोठरी से बोली

शुभचिंतक भाव-लता-

'रिश्तों को घर दिखलाओ, दूकान नहीं।'

सुनते थे जो पहले, अब वे कान नहीं।
कुँअर बेचैन

10 comments:

ओमकार चौधरी said...

बेचैन जी, बहुत अच्छी रचना है. आज के समाज का कटु सत्य. बधाई.
आपको यहाँ देख कर सुखद लगा.

ओमकार चौधरी said...

बेचैन जी, बहुत अच्छी रचना है. आज के समाज का कटु सत्य. बधाई.
आपको यहाँ देख कर सुखद लगा

शारदा अरोरा said...

कहाँ खो आए हम वो यादों के सुख
आंखों में झिलमिलाते तारों से
रिश्तों के विश्वास
आपकी कविता पढ़ कर बरबस ये भाव मन में जग गए

कुमार आशीष said...

नाक हो तो कान भी हो..

कंचन सिंह चौहान said...

bahut sahi... yathartha udbodhan ke satik shabda

शोभा said...

इतनी सुन्दर कविता पढ़वाने के लिए आभार।

dr. ashok priyaranjan said...

bahut prabhavshali kavita.


http://www.ashokvichar.blogspot.com

सचिन मिश्रा said...

Bahut badiya. sach se rubaru karne ke liye aabhar.

डॉ० कुअँर बेचैन said...

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद...

रंजना said...

छोड़ चेतना को

जड़ता तक

आना जीवन का

पत्थर में परिवर्तित पानी

मन के आँगन का-

यात्रा तो है; किंतु सही अभियान नहीं।

सुनते थे जो पहले, अब वे कान नहीं।
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कटु यथार्थ का मार्मिक भावपूर्ण सटीक चित्रण........भावुक कर गया